इस Website पर आपको प्रतिदिन जानकारी और काम की पोस्ट पढ़ने देखने और सुनने को मिलेगा
पवन सिंह पर चला पत्थर हुए आग बाबुला
Get link
Facebook
X
Pinterest
Email
Other Apps
-
भोजपुरी के सुपरस्टार पवन सिंह पर stage शो के दौरान किसी ने अचानक से पत्थर चला दिया भगवान का dhanywaad है कि ज्यादा चोट नही आयी Video देखने के लिए नीचे Watch Now पर क्लिक करे
मध्य प्रदेश में एक जनजाति है बैगा. ये राज्य के डिंडोरी ज़िले में पाई जाती है और इसकी गिनती कमजोर आदिवासी समूह में होती है. पोंडी गांव में बसी इस जनजाति की बस यही एक ख़ासियत नहीं है. ये पूरी दुनिया में अपने अनोखे जंगल बचाओ अभियान और ख़ुद के आत्मनिर्भर होने के लिए भी जानी जाती है, जिसकी शुरुआत आज से कई साल पहले हुई थी. चलिए जानते हैं इस ख़ास जनजाति और इसके अनोखे अभियान के बारे में… आत्मनिर्भर बनी इस जनजाति के जंगल बचाओ अभियान की शुरुआत साल 2006 में हुई थी. इसे 4 क्लास ड्राप आउट एक महिला उजियारो बाई केवटिया ने शुरू की थी. उन्होंने एक NGO के साथ मिलकर इसकी शुरुआत की थी जब वो यहां पर पानी को संरक्षित करने के इरादे से यहां आई थी. मगर उनके इस मकसद में रुकावट आईं जिसका मुख्य कारण जंगल की कटाई या फिर धीरे-धीरे उनका कम होना था. और पढ़े..
Watch Video बिहार के भागलपुर जिले में गोराडीह सड़क के किनारे बसे जिच्छो पोखर जो की एक प्राचीन पोखर है, यह पोखर करीब 200 साल पुराना है, लोगो मे इस पोखर को लिए एक बहुत बड़ी धार्मिक स्थल है, कहने मे वैसे तो ये पोखर है लेकिन इसकी मान्यता एक गंगा से भी बढ़कर दिया गया है, और तब से ही इसकी मान्यता बहुत बड़ी है, लोगो मे इस पोखर को लेकर एक अटूट विश्वास बना हुआ है, इस पोखर को जिच्छो मैया नाम दिया गया है, और भक्तो का कहना है की इस पोखर से लोगो का जो भी मन्नत होता है, जिच्छो मैया उनके मन्नत को जरूर पूरा करते है, सभी भक्तो की जो जिसकी जैसे मन्नत होता है वैसे ही मांगते है, और मन्नत पूरा होने के बाद भक्त वापस चढ़ावे के साथ पोखर पर आते है, और जिच्छो मैया को पूरी शरधा के साथ चढ़ावा चढ़ाते है, 200 साल पहले की बात करे तो, यहाँ पर जिच्छो पोखर के सिवाय और कुछ नही था, सिर्फ पोखर ही हुआ करता था, लेकिन जैसे जैसे लोगो मे शरधा भाव बढ़ता गया वैसे ही पोखर के आस पास सुविधाएं होती गई, चलिए जानते है आज के समय मे इस पोखर के आस पास क्या क्या सुविधाएं है, इस पोखर के पास एक दुर्गा मंद...
विशेष रूप से दलित जातियों में प्रचलित सती बिहुला की लोकगाथा अब अपनी जातीय सीमाओं से परे पूरे बिहार में पसंद की जाती है। यह कहानी सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं के समर्पण और महत्त्व को रेखांकित करती है। बिहार के अतिरिक्त बिहुला की कथा का उत्तर प्रदेश तथा बंगाल में भी प्रचार पाया जाता है। संक्षेप में इसकी कथा निम्नांकित है- "चन्दू साहू नामक एक प्रसिद्ध सौदागर था। इसके लड़के का नाम बाला लखन्दर था। यह रूप-यौवन से सम्पन्न तथा सुन्दर युवक था। अवस्था प्राप्त होने पर इसका विवाह सम्बन्ध 'बिहुला' नामक एक परम सुन्दरी कन्या से किया गया। चन्दू साहू के 6 लड़के विवाह के अवसर पर कोहबर में साँप के काटने से मर चुके थे। अत: बाला लखन्दर के विवाह के समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि पूर्व दुर्घटना की पुनरावृत्ति न होने पाये। इस विचार से ऐसा मकान बनाने का निश्चय हुआ, जिसमें कहीं भी छिद्र न हो। [३] विषहरी नामक ब्राह्मण , जो चन्दू सौदागर से द्वेष रखता था, बड़ी ही दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति था। उसने मकान बनाने वाले क...
Comments
Post a Comment